को भविष्य में कोई आशा शेष न रहना ही था। यह वास्तविकता भी उससे अलग नहीं है न? अतः उल्लास के उदाहरण से यह सिद्व हो चुका है कि कष्टों के कारण मनुष्य पागल बनता है और पागलपन के दौरे में वह फांसी लगाने का प्रयास करता है। मेरा यह विधान सत्य सिद्व हो रहा है कि राजबंदियों के
जीवन के नाश-आत्मवध, फांसी अथवा पागलों के रूग्णालय में जाने-का उत्तरदायित्तव मुख्य रूप में उस पद्वति पर है, जिससे उनसे व्यवहार किया जाता है- उस कठोर आचार-संहिता पर है,
को भविष्य में कोई आशा शेष न रहना ही था। यह वास्तविकता भी उससे अलग नहीं है न? अतः उल्लास के उदाहरण से यह सिद्व हो चुका है कि कष्टों के कारण मनुष्य पागल बनता है और पागलपन के दौरे में वह फांसी लगाने का प्रयास करता है। मेरा यह विधान सत्य सिद्व हो रहा है कि राजबंदियों के
जीवन के नाश-आत्मवध, फांसी अथवा पागलों के रूग्णालय में जाने-का उत्तरदायित्तव मुख्य रूप में उस पद्वति पर है, जिससे उनसे व्यवहार किया जाता है- उस कठोर आचार-संहिता पर है,