के पद से हाथ धो बैठना अथवा कोल्हू में जोते जाना।
राजबंदियों से बोलना असंभव था, फिर उनकी पुस्तक को स्वीकार करने के अपराध के बारे में क्या कहना? अतः छुट्टी के दिन कोई बाहर चला जाए तो इस बहाने से कि अलाने-फलाने भाई-बंदों से अमुक व्यक्ति को पुस्तक दी-उन क्रमिक प्रस्तकों को ठिकाने लगाना पड़ता।
इन पस्तकों के मार्ग में सरकारी बाधा की तरह ही बड़ी स्वयं उन अनाड़ी, नासमझ बंदीवानों की थी। पढ़ने का नाम लेते ही उनका पहला प्रश्न होता,
के पद से हाथ धो बैठना अथवा कोल्हू में जोते जाना।
राजबंदियों से बोलना असंभव था, फिर उनकी पुस्तक को स्वीकार करने के अपराध के बारे में क्या कहना? अतः छुट्टी के दिन कोई बाहर चला जाए तो इस बहाने से कि अलाने-फलाने भाई-बंदों से अमुक व्यक्ति को पुस्तक दी-उन क्रमिक प्रस्तकों को ठिकाने लगाना पड़ता।
इन पस्तकों के मार्ग में सरकारी बाधा की तरह ही बड़ी स्वयं उन अनाड़ी, नासमझ बंदीवानों की थी। पढ़ने का नाम लेते ही उनका पहला प्रश्न होता,