एकाएक बूढ़ा देवीदीन आकर खडाहो गया। दारोग़ा ने कठोर स्वर में कहा, 'क्या काम है यहां?'
देवीदीन-'हुजूर को सलाम करने चला आया। इन बेचारों पर दया की नज़र रहे हुजूर, बेचारे बडे सीधे आदमी हैं।'
दारोग़ा -'बचा सरकारी मुलज़िम को घर में छिपाते हो, उस पर सिफारिश करने आए हो!'
देवीदीन-'मैं क्या सिफारिस करूंगा हुजूर, दो कौड़ी का आदमी।'
दारोग़ा-'जानता है, इन पर वारंट है, सरकारी रूपये ग़बन कर गए हैं।'
देवीदीन-'हुजूर, भूल-चूक आदमी से ही तो होती है। जवानी की उम्र है ही,
एकाएक बूढ़ा देवीदीन आकर खडाहो गया। दारोग़ा ने कठोर स्वर में कहा, 'क्या काम है यहां?'
देवीदीन-'हुजूर को सलाम करने चला आया। इन बेचारों पर दया की नज़र रहे हुजूर, बेचारे बडे सीधे आदमी हैं।'
दारोग़ा -'बचा सरकारी मुलज़िम को घर में छिपाते हो, उस पर सिफारिश करने आए हो!'
देवीदीन-'मैं क्या सिफारिस करूंगा हुजूर, दो कौड़ी का आदमी।'
दारोग़ा-'जानता है, इन पर वारंट है, सरकारी रूपये ग़बन कर गए हैं।'
देवीदीन-'हुजूर, भूल-चूक आदमी से ही तो होती है। जवानी की उम्र है ही,