को अरसिक बनाये देती है। अब उन्हें रसिकता का उपदेश कौन देगा ?'
'अजी, उसने तो अभी हमारे हारों के दाम भी नहीं दिये।'
'मेरे भी पचास जोड़ों के दाम आते हैं।'
'सभी का कुछन-कुछ उस पर आता है।'
'जब वह चली जायेगी तो नायिकाओें का पार्ट कौन खेलेगा ?'
'इस क्षति की पूर्ति नहीं हो सकती।'
'उसका स्थान सदैव रिक्त रहेगा।'
'उसके द्वार बन्द हो जायेंगे तो जीवन का आनन्द ही जाता रहेगा।'
'वह इस्कन्द्रिया के गगन का सूर्य थी।'
इतनी देर में नगर भर के भिक्षुक,
को अरसिक बनाये देती है। अब उन्हें रसिकता का उपदेश कौन देगा ?'
'अजी, उसने तो अभी हमारे हारों के दाम भी नहीं दिये।'
'मेरे भी पचास जोड़ों के दाम आते हैं।'
'सभी का कुछन-कुछ उस पर आता है।'
'जब वह चली जायेगी तो नायिकाओें का पार्ट कौन खेलेगा ?'
'इस क्षति की पूर्ति नहीं हो सकती।'
'उसका स्थान सदैव रिक्त रहेगा।'
'उसके द्वार बन्द हो जायेंगे तो जीवन का आनन्द ही जाता रहेगा।'
'वह इस्कन्द्रिया के गगन का सूर्य थी।'
इतनी देर में नगर भर के भिक्षुक,