अपंग, लूले, लंगड़े, को़ी, अन्धे सब उस स्थान पर जमा हो गये और जली हुई वस्तुओं को टटोलते हुए बोले-अब हमारा पालन कौन करेगा ? उसकी मेज का जूठन खाकर दो सौ अभागों के पेट भर जाते थे ? उसके परेमीगण चलते समय हमें मुट्ठियां भर रुपयेपैसे दान कर देते थे।
चोरचकारों की भी बन आयी। वह भी आकर इस भीड़ में मिल गये और शोर मचामचाकर अपने पास के आदमियों को केलने लगे कि दंगा हो जाये और उस गोलमाल में हम भी किसी वस्तु पर हाथ साफ करें। यद्यपि बहुत कुछ जल चुका था,
अपंग, लूले, लंगड़े, को़ी, अन्धे सब उस स्थान पर जमा हो गये और जली हुई वस्तुओं को टटोलते हुए बोले-अब हमारा पालन कौन करेगा ? उसकी मेज का जूठन खाकर दो सौ अभागों के पेट भर जाते थे ? उसके परेमीगण चलते समय हमें मुट्ठियां भर रुपयेपैसे दान कर देते थे।
चोरचकारों की भी बन आयी। वह भी आकर इस भीड़ में मिल गये और शोर मचामचाकर अपने पास के आदमियों को केलने लगे कि दंगा हो जाये और उस गोलमाल में हम भी किसी वस्तु पर हाथ साफ करें। यद्यपि बहुत कुछ जल चुका था,