जिसने कितनी ही बार मेरे मन में पवित्र विचारों की पररेणा की है। वह पुस्तक रखी हुई है जिसके द्वारा मैंने सैकड़ों बार ईश्वर का स्वरूप देखा है। तिस पर भी यह सभी चीजें न जाने क्यों मुझे अपरिचितसी जान पड़ती हैं, इनका वह स्वरूप नहीं रहा। ऐसा परतीत होता है कि उनकी स्वाभाविकता शोभा का अपहरण हो गया है, मानो मुझ पर उनका स्नेह ही नहीं रहा। और मैं पहली ही बार उन्हें देख रहा हूं। जब मैं इस मेज और इस पलंग पर, जो मैंने किसी समय अपने हाथों से बनाये थे,
जिसने कितनी ही बार मेरे मन में पवित्र विचारों की पररेणा की है। वह पुस्तक रखी हुई है जिसके द्वारा मैंने सैकड़ों बार ईश्वर का स्वरूप देखा है। तिस पर भी यह सभी चीजें न जाने क्यों मुझे अपरिचितसी जान पड़ती हैं, इनका वह स्वरूप नहीं रहा। ऐसा परतीत होता है कि उनकी स्वाभाविकता शोभा का अपहरण हो गया है, मानो मुझ पर उनका स्नेह ही नहीं रहा। और मैं पहली ही बार उन्हें देख रहा हूं। जब मैं इस मेज और इस पलंग पर, जो मैंने किसी समय अपने हाथों से बनाये थे,