अलंकार - Alankar

ही पराणी हूं। मैं ही मृत आत्मा हूं ! हे भगवान ! यह क्या रहस्य है ? मुझमें से कौनसी वस्तु लुप्त हो गयी है, मुझमें अब क्या शेष रह गया है ? मैं कौन हूं ?

और सबसे बड़ी आशंका की बात यह थी कि मन को बारबार इस शंका की निमूर्लता का विश्वास दिलाने पर भी उसे ऐसा भाषित होता था कि उसकी कुटी बहुत तंग हो गयी यद्यपि धार्मिक भाव से उसे इस स्थान को अनंत समझना चाहिए था, क्योंकि अनन्त का भाग भी अनन्त ही होता है, क्योंकि यहीं बैठकर वह ईश्वर की अनन्तता में विलीन हो जाता था।


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ही पराणी हूं। मैं ही मृत आत्मा हूं ! हे भगवान ! यह क्या रहस्य है ? मुझमें से कौनसी वस्तु लुप्त हो गयी है, मुझमें अब क्या शेष रह गया है ? मैं कौन हूं ?

और सबसे बड़ी आशंका की बात यह थी कि मन को बारबार इस शंका की निमूर्लता का विश्वास दिलाने पर भी उसे ऐसा भाषित होता था कि उसकी कुटी बहुत तंग हो गयी यद्यपि धार्मिक भाव से उसे इस स्थान को अनंत समझना चाहिए था, क्योंकि अनन्त का भाग भी अनन्त ही होता है, क्योंकि यहीं बैठकर वह ईश्वर की अनन्तता में विलीन हो जाता था।


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