अलंकार - Alankar

करना चाहता है। तू उसे मेरी आंखों के सामने परस्तुत करता है, क्योंकि अब उसकी मुस्कान नि:शास्त्र, उसका सौन्दर्य निष्कलंक और उसके हावभाव उद्देश्यहीन हो गये हैं। मेरे दयालु पतितपावन परभु, तू मुझे परसन्न करने के निमित्त उसे मेरे सम्मुख उसी शुद्ध और परिमार्जित स्वरूप में लाता है जो मैंने तेरी इच्छाओं के अनुकूल उसे दिया है, जैसे एक मित्र परसन्न होकर दूसरे मित्र को उसके दिये हुए उपहार की याद दिलाता है। इस कारण मैं इस स्त्री को देखकर आनन्दित होता हूं,


495 of 707

करना चाहता है। तू उसे मेरी आंखों के सामने परस्तुत करता है, क्योंकि अब उसकी मुस्कान नि:शास्त्र, उसका सौन्दर्य निष्कलंक और उसके हावभाव उद्देश्यहीन हो गये हैं। मेरे दयालु पतितपावन परभु, तू मुझे परसन्न करने के निमित्त उसे मेरे सम्मुख उसी शुद्ध और परिमार्जित स्वरूप में लाता है जो मैंने तेरी इच्छाओं के अनुकूल उसे दिया है, जैसे एक मित्र परसन्न होकर दूसरे मित्र को उसके दिये हुए उपहार की याद दिलाता है। इस कारण मैं इस स्त्री को देखकर आनन्दित होता हूं,


495 of 707