सोचा-इन दो बातों में से एक बात है या तो वह स्वप्न की भांति ईश्वर का परेरित किया हुआ था और शुभस्वप्न था, और यह मेरी स्वाभाविक दुबुर्द्धि है जिसने उसे यह भयंकर रूप दे दिया है, जैसे गन्दे प्याले में अंगूर का रस खट्टा हो जाता है, मैंने अपने अज्ञानवश ईश्वरीय आदेश को ईश्वरीय तिरस्कार का रूप दे दिया और इस गीदड़ रूपी शैतान ने मेरी शंकान्वित दशा से लाभ उठाया, अथवा इस स्वप्न का परेरक ईश्वर नहीं, पिशाच था। ऐसी दशा में यह शंका होती
सोचा-इन दो बातों में से एक बात है या तो वह स्वप्न की भांति ईश्वर का परेरित किया हुआ था और शुभस्वप्न था, और यह मेरी स्वाभाविक दुबुर्द्धि है जिसने उसे यह भयंकर रूप दे दिया है, जैसे गन्दे प्याले में अंगूर का रस खट्टा हो जाता है, मैंने अपने अज्ञानवश ईश्वरीय आदेश को ईश्वरीय तिरस्कार का रूप दे दिया और इस गीदड़ रूपी शैतान ने मेरी शंकान्वित दशा से लाभ उठाया, अथवा इस स्वप्न का परेरक ईश्वर नहीं, पिशाच था। ऐसी दशा में यह शंका होती