अलंकार - Alankar

है कि पहले के स्वप्नों को देवकृत समझने में मेरी भरांति थी। सारांश यह कि इस समय मुझमें वह धमार्धर्म का ज्ञान नहीं रहा जो तपस्वी के लिए परमावश्यक है और जिसके बिना उसके पगपग पर ठोकर खाने की आशंका रहती है कि ईश्वर मेरे साथ नहीं रहा-जिसके कुफल मैं भोग रहा हूं, यद्यपि उसके कारण नहीं निश्चित कर सकता।

इस भांति तर्क करके उसने बड़ी ग्लानि के साथ जिज्ञासा की-दयालु पिता! तू अपने भक्त से क्या परायश्चित कराना चाहता है, यदि उसकी भावनाएं ही उसकी आंखों पर परदा डाल दें,


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है कि पहले के स्वप्नों को देवकृत समझने में मेरी भरांति थी। सारांश यह कि इस समय मुझमें वह धमार्धर्म का ज्ञान नहीं रहा जो तपस्वी के लिए परमावश्यक है और जिसके बिना उसके पगपग पर ठोकर खाने की आशंका रहती है कि ईश्वर मेरे साथ नहीं रहा-जिसके कुफल मैं भोग रहा हूं, यद्यपि उसके कारण नहीं निश्चित कर सकता।

इस भांति तर्क करके उसने बड़ी ग्लानि के साथ जिज्ञासा की-दयालु पिता! तू अपने भक्त से क्या परायश्चित कराना चाहता है, यदि उसकी भावनाएं ही उसकी आंखों पर परदा डाल दें,


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