अलंकार - Alankar

और अब उसकी विलीनता भी भयंकर परतीत होती थी। इस स्वप्न को विस्मृत करने के लिए, इस विचार से उसके मन को हटाने के लिए अब कोई अवलम्ब, कोई साधन, कोई सहारा नहीं था। उसने अपने को धिक्कारा-मैंने क्यों उसे भगा न दिया ? मैंने अपने को उसके घृणित आलिंगन और तापमय करों से क्यों न छुड़ा लिया ?

अब वह उस भरष्ट चारपाई के समीप ईश्वर का नाम लेने का भी साहस न कर सकता था, और उसे यह भय होता था कि कुटी के अपवित्र हो जाने के कारण पिशाचगण स्वेच्छानुसार अन्दर परविष्ट हो जायेंगे,


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और अब उसकी विलीनता भी भयंकर परतीत होती थी। इस स्वप्न को विस्मृत करने के लिए, इस विचार से उसके मन को हटाने के लिए अब कोई अवलम्ब, कोई साधन, कोई सहारा नहीं था। उसने अपने को धिक्कारा-मैंने क्यों उसे भगा न दिया ? मैंने अपने को उसके घृणित आलिंगन और तापमय करों से क्यों न छुड़ा लिया ?

अब वह उस भरष्ट चारपाई के समीप ईश्वर का नाम लेने का भी साहस न कर सकता था, और उसे यह भय होता था कि कुटी के अपवित्र हो जाने के कारण पिशाचगण स्वेच्छानुसार अन्दर परविष्ट हो जायेंगे,


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