स्वदेश, स्वजाति की धारणाएं उभरती हैं। जब हम इतिहास का वर्णन करते हैं, तब उनके मुखमंडल पर भी आभा चमकने लगती है। क्या वे पतित हैं? और हम क्या हैं? हम भी जन्मजात मुक्त थोड़े ही है? यदि उन्हें सुधारा जाए तो वे भी सुधरेंगे। अतः जब तक अन्य अधिक महत्तवपूर्ण देशकार्य मंे हम असमर्थ हैं तब तक इस अत्यंत कष्टप्रद कार्य को कार्यान्वित करने मे ही वास्तविक देशसेवा है। अपने इन दीन-हीन पतित बंधुओं को शाब्दिक, बौद्विक, राष्ट्रीय तथा आत्मीय शिक्षा देने की जितनी योग्यता हम में है,
स्वदेश, स्वजाति की धारणाएं उभरती हैं। जब हम इतिहास का वर्णन करते हैं, तब उनके मुखमंडल पर भी आभा चमकने लगती है। क्या वे पतित हैं? और हम क्या हैं? हम भी जन्मजात मुक्त थोड़े ही है? यदि उन्हें सुधारा जाए तो वे भी सुधरेंगे। अतः जब तक अन्य अधिक महत्तवपूर्ण देशकार्य मंे हम असमर्थ हैं तब तक इस अत्यंत कष्टप्रद कार्य को कार्यान्वित करने मे ही वास्तविक देशसेवा है। अपने इन दीन-हीन पतित बंधुओं को शाब्दिक, बौद्विक, राष्ट्रीय तथा आत्मीय शिक्षा देने की जितनी योग्यता हम में है,