का इतिहास लिखते समय हमें बंगला पुस्तकों का प्रथम दर्शन हुआ था। रजनीकांत बाबू का ‘सिपाही युद्वेतर इतिहास’ गं्रथ इस उद्देश्य से कि उसमें कुछ नया तथ्य प्राप्त होगा, हमने अपने बंगाली मित्र से पढ़वाया था। हम बंगला बोलना तथा पढ़ना तो सीख गए, तथापि बंगला अक्षर हम लिख नहीं सकते थे। इस बात पर हमें आश्चर्य भी होता था। फिर उसे भी आत्मसात् किया। अंगुलियों को अक्षरों का परिचय कुछ अधिक नहीं है। रामकृष्ण के लीलामृत-कथामृत आदि अनेक खंडों में पूर्ण किया हुआ चरित्र,
का इतिहास लिखते समय हमें बंगला पुस्तकों का प्रथम दर्शन हुआ था। रजनीकांत बाबू का ‘सिपाही युद्वेतर इतिहास’ गं्रथ इस उद्देश्य से कि उसमें कुछ नया तथ्य प्राप्त होगा, हमने अपने बंगाली मित्र से पढ़वाया था। हम बंगला बोलना तथा पढ़ना तो सीख गए, तथापि बंगला अक्षर हम लिख नहीं सकते थे। इस बात पर हमें आश्चर्य भी होता था। फिर उसे भी आत्मसात् किया। अंगुलियों को अक्षरों का परिचय कुछ अधिक नहीं है। रामकृष्ण के लीलामृत-कथामृत आदि अनेक खंडों में पूर्ण किया हुआ चरित्र,