में ही रह जाता और मन इतना कर्मपराड्मुख होता कि घंटों तक यह सुध-बुध ही नहीं रहती कि इस देह में इंद्रियां हैं या नहीं। कदम आगे नहीं बढ़ते, प्रतीत होता कि सबकुछ छोड़ दें। प्रचार कार्य भी मात्र लड़कखेल लगता। अंत में प्रकृति प्रवृत्तिा को हठात्, बलपूर्वक स्फुरण देकर कार्य में जुटाती।
इसके विपरीत, इतिहास और भौतिकशास्त्र पढ़ते रहने से स्वाभाविक कार्य-लालसा कभी-कभी इतनी प्रदीप्त होती, महायुद्व के हिंदुस्थान के तात्कालिक क्रांतिकारी आघात-प्रत्याघातों के,
में ही रह जाता और मन इतना कर्मपराड्मुख होता कि घंटों तक यह सुध-बुध ही नहीं रहती कि इस देह में इंद्रियां हैं या नहीं। कदम आगे नहीं बढ़ते, प्रतीत होता कि सबकुछ छोड़ दें। प्रचार कार्य भी मात्र लड़कखेल लगता। अंत में प्रकृति प्रवृत्तिा को हठात्, बलपूर्वक स्फुरण देकर कार्य में जुटाती।
इसके विपरीत, इतिहास और भौतिकशास्त्र पढ़ते रहने से स्वाभाविक कार्य-लालसा कभी-कभी इतनी प्रदीप्त होती, महायुद्व के हिंदुस्थान के तात्कालिक क्रांतिकारी आघात-प्रत्याघातों के,