डाके, ठगी आदि लौकिक व्यवसायार्थ अत्यावश्यक होता है। जिन्हें बंबई जैसी महानगरी के चोरों के अड्डों की जानकारी है, उन्हें ज्ञात है कि इन लोगों के भी महंत होते हैं। वे अत्यंत शिष्ट तथा माननीय व्यवसाय करते हुए साझे में दुकान चलाते हैं। उनके अधिकार में नित्य नौसिखिया बच्चे खटते हैं। इन बच्चों को उनकी प्रशिक्षा के अनुसार जेबकतरे की पहली कक्षा से, खिड़की तोड़ने की दूसरी कक्षा तक, तिजोरी तोड़ने की तीसरी कक्षा से धमकाकर खुल्लमखुल्ला
डाके, ठगी आदि लौकिक व्यवसायार्थ अत्यावश्यक होता है। जिन्हें बंबई जैसी महानगरी के चोरों के अड्डों की जानकारी है, उन्हें ज्ञात है कि इन लोगों के भी महंत होते हैं। वे अत्यंत शिष्ट तथा माननीय व्यवसाय करते हुए साझे में दुकान चलाते हैं। उनके अधिकार में नित्य नौसिखिया बच्चे खटते हैं। इन बच्चों को उनकी प्रशिक्षा के अनुसार जेबकतरे की पहली कक्षा से, खिड़की तोड़ने की दूसरी कक्षा तक, तिजोरी तोड़ने की तीसरी कक्षा से धमकाकर खुल्लमखुल्ला