हुए और अधिक कष्टप्रद अवस्था में पड़ने योग्य दैहिक शक्ति तो मनुष्य के पास होनी चाहिए न! उनका बोझ वे ढो ही रहे थे। वास्तव में दूसरे काम
दूसरे लोगों को करने चाहिए थे। अतः राजबंदियों में कुछ यह कहते कि रहने भी दो, यह नया पचड़ा। उन क्रूर, कराल पठानी जमादार, हवलदारों से भिडं़त न होते हुए भी जीना हराम है, उसमें उनकी धर्मांधता का प्रतिरोध करके उनका रोष अपने ऊपर कौन ले? एक दृष्टि से उनका तर्क स्वाभाविक ही था। परंतु इसमें कोई
हुए और अधिक कष्टप्रद अवस्था में पड़ने योग्य दैहिक शक्ति तो मनुष्य के पास होनी चाहिए न! उनका बोझ वे ढो ही रहे थे। वास्तव में दूसरे काम
दूसरे लोगों को करने चाहिए थे। अतः राजबंदियों में कुछ यह कहते कि रहने भी दो, यह नया पचड़ा। उन क्रूर, कराल पठानी जमादार, हवलदारों से भिडं़त न होते हुए भी जीना हराम है, उसमें उनकी धर्मांधता का प्रतिरोध करके उनका रोष अपने ऊपर कौन ले? एक दृष्टि से उनका तर्क स्वाभाविक ही था। परंतु इसमें कोई