संदेह नहीं कि उन दो-चार लोगों का आचरण निंदनीय था, जो इस सत्य को प्रांजलता से स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे कि अधिक कष्ट सहने की उनमें शक्ति नहीं है, बल्कि यह प्रतिपादित करते कि मुसलमानों के भ्रष्टीकरण का प्रतिकार करने का प्रयास ही निपट मूर्खता है और इस बहाने से वे अपनी कायरता एवं भीरूता को ढकना चाहते थे। उनमंे कुछ लोग तो मुसलमान जमादार को प्रसन्न करने के लिए इस तरह नित्य आभास कराते हुए कालयापन करते कि वे भी शीध्र
संदेह नहीं कि उन दो-चार लोगों का आचरण निंदनीय था, जो इस सत्य को प्रांजलता से स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे कि अधिक कष्ट सहने की उनमें शक्ति नहीं है, बल्कि यह प्रतिपादित करते कि मुसलमानों के भ्रष्टीकरण का प्रतिकार करने का प्रयास ही निपट मूर्खता है और इस बहाने से वे अपनी कायरता एवं भीरूता को ढकना चाहते थे। उनमंे कुछ लोग तो मुसलमान जमादार को प्रसन्न करने के लिए इस तरह नित्य आभास कराते हुए कालयापन करते कि वे भी शीध्र