‘अरे भाई, कैसी भ्रष्टता और शुद्वि? इस तरह के ये पतित अपराधी नीच लोग हिंदू समाज में रहें या न रहें, कोई अंतर नहीं पड़ता। उनके हिंदू होने से क्या लाभ? जो भय के मारे या पैसे के लिए मुसलमान बनते हैं, उन्हें बनाने का काम केवल बचपना है।’ सुपरिंटेंडेंट, बारी, कमिश्नर आदि अंग्रेज अधिकारी भी हमसे यही कहते। ढोंगी, मक्कार, कपटी मुसलमान भी हमें यही पाठ पढ़ाना चाहते थे। शुद्विकरण पर यह आक्षेप आज भी स्वधर्मीय सच्चे परंतु भोले लोगों द्वारा लगाए जाते हैं,
‘अरे भाई, कैसी भ्रष्टता और शुद्वि? इस तरह के ये पतित अपराधी नीच लोग हिंदू समाज में रहें या न रहें, कोई अंतर नहीं पड़ता। उनके हिंदू होने से क्या लाभ? जो भय के मारे या पैसे के लिए मुसलमान बनते हैं, उन्हें बनाने का काम केवल बचपना है।’ सुपरिंटेंडेंट, बारी, कमिश्नर आदि अंग्रेज अधिकारी भी हमसे यही कहते। ढोंगी, मक्कार, कपटी मुसलमान भी हमें यही पाठ पढ़ाना चाहते थे। शुद्विकरण पर यह आक्षेप आज भी स्वधर्मीय सच्चे परंतु भोले लोगों द्वारा लगाए जाते हैं,