शाम तक तेल कम भरते ही नित्य लातों-घूंसों-सोटियों से बंदियों को कुटते-पिटते हर कोई देखत था। इस डर के कारण पेट में भले ही चूहे कूद रहे हों, कोल्हू घुमाते-घुमाते, उस थाली में से, जिसमें खड़े-खड़े पसीने की धार गिर रही है, ग्रास उठाकर मुंह में ठूंसते, जैसे-जैसे उसे निगलते और कोल्हू चलाते-चलाते ही भोजन करते अनेक बंदियों को मैंने कई बार अपनी आंखों से देखा है।
इस प्रकार उस अद्भुत भोजन से निपटकर पुनः पांच बजे तक कोल्हू चलाना
शाम तक तेल कम भरते ही नित्य लातों-घूंसों-सोटियों से बंदियों को कुटते-पिटते हर कोई देखत था। इस डर के कारण पेट में भले ही चूहे कूद रहे हों, कोल्हू घुमाते-घुमाते, उस थाली में से, जिसमें खड़े-खड़े पसीने की धार गिर रही है, ग्रास उठाकर मुंह में ठूंसते, जैसे-जैसे उसे निगलते और कोल्हू चलाते-चलाते ही भोजन करते अनेक बंदियों को मैंने कई बार अपनी आंखों से देखा है।
इस प्रकार उस अद्भुत भोजन से निपटकर पुनः पांच बजे तक कोल्हू चलाना