तेल उंडेलकर रोते-रोते वापस लौटते हुए मुझे आज भी दिखाई दे रहे हैं। नम्र स्वभाव के बंदियों की यह अवस्था होती थी। तनिक हेकड़ या क्रोधी होता तो उसे हथकड़ी, डंडा-बेड़ी आदि मारपीट से अधिक आसान दंड था। इस व्यवस्था के कारण बंदीगृह में कदम रखते ही सज्जनताजन्य सच्चाई, अवशिष्ट लज्जा भी छूट जाती है। ऐसे ही लोग अंत तक बंदीगृह में जीवित बच पाते हैं या जो जीते हैं-वे अधिकतर उनमें से ही होते हैं।
रात्रि में कोल्हू पर काम
निर्लज्ज क्रोधी,
तेल उंडेलकर रोते-रोते वापस लौटते हुए मुझे आज भी दिखाई दे रहे हैं। नम्र स्वभाव के बंदियों की यह अवस्था होती थी। तनिक हेकड़ या क्रोधी होता तो उसे हथकड़ी, डंडा-बेड़ी आदि मारपीट से अधिक आसान दंड था। इस व्यवस्था के कारण बंदीगृह में कदम रखते ही सज्जनताजन्य सच्चाई, अवशिष्ट लज्जा भी छूट जाती है। ऐसे ही लोग अंत तक बंदीगृह में जीवित बच पाते हैं या जो जीते हैं-वे अधिकतर उनमें से ही होते हैं।
रात्रि में कोल्हू पर काम
निर्लज्ज क्रोधी,