कुर्सी पर बैठकर ऊंघ रहा है और बीच में ही मां-बहन की गालियां बकते हुए इस तरह चिल्ला रहा है,‘‘अब तक तेल पूरा नहीं हुआ, तो मारो साले को बेंत, कल मारना तो आज मारो।’’
रोग का स्वाॅंग
जिनके हाथों को इस तरह के कठोर परिश्रम ने कभी स्पर्श तक नहीं किया था, उन्हें कोल्हू का काम महीनों तक दिया गया। इनमें काॅलेज में अध्ययन-अध्यापन करनेवाले तथा सत्रह वर्ष के लड़के भी थे। उनके कष्ट की सीमा नहीं थी। उनमें जब कुछ बीमार पड़ गए तब वे सोचने लगे,
कुर्सी पर बैठकर ऊंघ रहा है और बीच में ही मां-बहन की गालियां बकते हुए इस तरह चिल्ला रहा है,‘‘अब तक तेल पूरा नहीं हुआ, तो मारो साले को बेंत, कल मारना तो आज मारो।’’
रोग का स्वाॅंग
जिनके हाथों को इस तरह के कठोर परिश्रम ने कभी स्पर्श तक नहीं किया था, उन्हें कोल्हू का काम महीनों तक दिया गया। इनमें काॅलेज में अध्ययन-अध्यापन करनेवाले तथा सत्रह वर्ष के लड़के भी थे। उनके कष्ट की सीमा नहीं थी। उनमें जब कुछ बीमार पड़ गए तब वे सोचने लगे,