संध्या समय तेल नापकर ‘हुश्श’ करते हुए जो सोने की कोठरी में लकड़ी के लट्ठे पर या तख्त पर अपना शरीर पटकते, तब सारे शरीर में पीड़ा होने लगती। फिर आंख लगी नहीं कि दूसरी सुबह। फिर वही आधासीसी, वही जमादार, वही काले अधिकारियों का अपमान और यंत्रणा-वही कोल्हू के साथ खड़ा रहना। इस तरह सप्ताह, महीने कष्ट और अत्याचारों की पराकाष्ठा में बिताते हुए इसी तरह सारा जन्म बिताना था।
नहीं चाहिए यह जीवन
उन यातनाओं का कितना बखान करें? परंतु
संध्या समय तेल नापकर ‘हुश्श’ करते हुए जो सोने की कोठरी में लकड़ी के लट्ठे पर या तख्त पर अपना शरीर पटकते, तब सारे शरीर में पीड़ा होने लगती। फिर आंख लगी नहीं कि दूसरी सुबह। फिर वही आधासीसी, वही जमादार, वही काले अधिकारियों का अपमान और यंत्रणा-वही कोल्हू के साथ खड़ा रहना। इस तरह सप्ताह, महीने कष्ट और अत्याचारों की पराकाष्ठा में बिताते हुए इसी तरह सारा जन्म बिताना था।
नहीं चाहिए यह जीवन
उन यातनाओं का कितना बखान करें? परंतु