पुनः अड़गोड़े में खडे़ रहने में मल का ही हीं अपितु मूत्र का भी चार-चार पांच-पांच घंटे अवरोध करना पड़ता। प्रातःकाल छह से लेकर दस बजे तक और अपराह्न बारह से पांच बजे तक हथकड़ियों में टंगे खड़े रहना पड़ता । उस समय शौच के लिए तो क्या, लघुशंका के लिए भी नहीं छोड़ा जाता। इस त्रास की मार सभी बंदियों पर एक जैसी होती, परतंु राजबंदियों को तो बहुत ही कष्टप्रद होता, क्यांेकि उन्हें प्रायः दिन में भी कोठरी में या इमारत में बंद रखा जाता,
पुनः अड़गोड़े में खडे़ रहने में मल का ही हीं अपितु मूत्र का भी चार-चार पांच-पांच घंटे अवरोध करना पड़ता। प्रातःकाल छह से लेकर दस बजे तक और अपराह्न बारह से पांच बजे तक हथकड़ियों में टंगे खड़े रहना पड़ता । उस समय शौच के लिए तो क्या, लघुशंका के लिए भी नहीं छोड़ा जाता। इस त्रास की मार सभी बंदियों पर एक जैसी होती, परतंु राजबंदियों को तो बहुत ही कष्टप्रद होता, क्यांेकि उन्हें प्रायः दिन में भी कोठरी में या इमारत में बंद रखा जाता,