वह भी ‘बीमार’ ही रहता। रोग हद से बढ़ जाने पर ही डाॅक्टर बीमारी का प्रमाण-पत्र देते। अतः राजबंदियों को देहधर्म यथावसर पूर्ण न कर सकने के कारण असह्म कष्ट झेलने पड़ते। अर्थात् मेरे ज्येष्ठ बंधु आंव के विकार से पीड़ित हैं, यह बात सिपाहियों, जमादार तका डाॅक्टर के कानों में उतरने के लिए भी दो-तीन दिन लग गए। पेट में पीड़ा होकर दस्त होने लगे। उस पर भी बंदीगृह का कच्चा-पक्का चावल खाकर छिलका कूटते हुए कोठरी में बंद पड़े रहना। अतः दोपहर
वह भी ‘बीमार’ ही रहता। रोग हद से बढ़ जाने पर ही डाॅक्टर बीमारी का प्रमाण-पत्र देते। अतः राजबंदियों को देहधर्म यथावसर पूर्ण न कर सकने के कारण असह्म कष्ट झेलने पड़ते। अर्थात् मेरे ज्येष्ठ बंधु आंव के विकार से पीड़ित हैं, यह बात सिपाहियों, जमादार तका डाॅक्टर के कानों में उतरने के लिए भी दो-तीन दिन लग गए। पेट में पीड़ा होकर दस्त होने लगे। उस पर भी बंदीगृह का कच्चा-पक्का चावल खाकर छिलका कूटते हुए कोठरी में बंद पड़े रहना। अतः दोपहर