उन्होंने किस वर्तन क्रम का आश्रय लिया। लड़ते-लड़ते मरो अथवा जियो, इन उभय पक्षों के लोगों ने संगठित होकर तय किया कि आखिर उन्हें जो यंत्रनाएं झेलनी पड़ती हैं उनका प्रतिकार न सही, प्रतिषेध के रूप में कठोर परिश्रम के काम वे नहीं करेंगे। यह निश्चय सर्वप्रथम तब व्यक्त हुआ जब हड़ताल थी। इसका स्वरूप छोटा था, परंतु बंदीगृह में और बारी साहब की छाती पर आपसी एकता से हड़ताल करना इतनी साहसपूर्ण बात मानी गई कि उन इने-गिने लोगों के संगठित
उन्होंने किस वर्तन क्रम का आश्रय लिया। लड़ते-लड़ते मरो अथवा जियो, इन उभय पक्षों के लोगों ने संगठित होकर तय किया कि आखिर उन्हें जो यंत्रनाएं झेलनी पड़ती हैं उनका प्रतिकार न सही, प्रतिषेध के रूप में कठोर परिश्रम के काम वे नहीं करेंगे। यह निश्चय सर्वप्रथम तब व्यक्त हुआ जब हड़ताल थी। इसका स्वरूप छोटा था, परंतु बंदीगृह में और बारी साहब की छाती पर आपसी एकता से हड़ताल करना इतनी साहसपूर्ण बात मानी गई कि उन इने-गिने लोगों के संगठित