स्नान भोजन आदि आवश्यक कार्य ठीक-ठाक तो क्या, थोड़ा भी नहीं करने देते। परंतु इन महाशय को इससे क्या? वे आराम से स्नान के हौज पर जाते, अच्छी तरह से शरीर को मल-मलकर स्नान करते, उसके पश्चात् भोजन के लिए चे जाते। तब मार-पीटकर पेटी अफसर उन्हें पुनः काम में जुटा चुकते थे। इन महाशय को भी भरपूर गालियों का भोजन मिलता। परंतु वे उस पर कान तक न देते हुए ऐसे ठाठ से भोजन करने में लीन रहते जैसे वह गालियांे की बौछार किसी और पर हो रही है,
स्नान भोजन आदि आवश्यक कार्य ठीक-ठाक तो क्या, थोड़ा भी नहीं करने देते। परंतु इन महाशय को इससे क्या? वे आराम से स्नान के हौज पर जाते, अच्छी तरह से शरीर को मल-मलकर स्नान करते, उसके पश्चात् भोजन के लिए चे जाते। तब मार-पीटकर पेटी अफसर उन्हें पुनः काम में जुटा चुकते थे। इन महाशय को भी भरपूर गालियों का भोजन मिलता। परंतु वे उस पर कान तक न देते हुए ऐसे ठाठ से भोजन करने में लीन रहते जैसे वह गालियांे की बौछार किसी और पर हो रही है,