मेरा आजीवन कारावास - Mera Aajivan Karavas

वह दुःख कुछ भी नहीं है। इतने दुःखद जीवन में सुख कदाचित् ही प्रतिभासित होता है।

बंधु से मिलने की उत्कष्ट इच्छा स्वाभाविक थी। वाॅर्डर और पेटी अफसर की अनुनय करके देखा कि येन-केन पउायों से कवेल उनकी एक सरसरी दृष्ट क्यों न हो, परंतु गुप्त रूप से इसलिए कि मैंने अपने बंधु के संबंध में बारी साहब और सुपरिंटेंडेंट से भ्ज्ञी कई बार पूछा। वे कहते, ‘हम आपको यह भी नहीं बता सकते कि वे कारागृह में हैं या नहीं। फिर भेंट कराने की बात तो दूर ही रही।’ एक बार सुना,


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वह दुःख कुछ भी नहीं है। इतने दुःखद जीवन में सुख कदाचित् ही प्रतिभासित होता है।

बंधु से मिलने की उत्कष्ट इच्छा स्वाभाविक थी। वाॅर्डर और पेटी अफसर की अनुनय करके देखा कि येन-केन पउायों से कवेल उनकी एक सरसरी दृष्ट क्यों न हो, परंतु गुप्त रूप से इसलिए कि मैंने अपने बंधु के संबंध में बारी साहब और सुपरिंटेंडेंट से भ्ज्ञी कई बार पूछा। वे कहते, ‘हम आपको यह भी नहीं बता सकते कि वे कारागृह में हैं या नहीं। फिर भेंट कराने की बात तो दूर ही रही।’ एक बार सुना,


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