अवस्था में गुप्त उपायों से लंबे समय से बिछुडे़ अपने ज्येष्ठ बंधु के पुण्य दर्शन पाने के प्रयास में था। विलायत जात¹ े समय मुझे विदा करने जो लोग आए हुए थे, उसी समय मैंने ज्येष्ठ भ्राता के दर्शन किए थे। उसके पश्चात् इस बंदीगृह में उनका दर्शन करने का प्रसंग आया। मन-ही-मन सोचा, उन्हें अत्यंत खेद होगा, अतः भंेट को टाला गया जाए। परंतु इस तरह मुंह मोड़ना क्या दुःखों का सामना करने से जी चुराना नहीं है? दुःख का विशाल गजराज तो ह्नदय के पोखर में घुसा बैठा है, अब भला उसकी
अवस्था में गुप्त उपायों से लंबे समय से बिछुडे़ अपने ज्येष्ठ बंधु के पुण्य दर्शन पाने के प्रयास में था। विलायत जात¹ े समय मुझे विदा करने जो लोग आए हुए थे, उसी समय मैंने ज्येष्ठ भ्राता के दर्शन किए थे। उसके पश्चात् इस बंदीगृह में उनका दर्शन करने का प्रसंग आया। मन-ही-मन सोचा, उन्हें अत्यंत खेद होगा, अतः भंेट को टाला गया जाए। परंतु इस तरह मुंह मोड़ना क्या दुःखों का सामना करने से जी चुराना नहीं है? दुःख का विशाल गजराज तो ह्नदय के पोखर में घुसा बैठा है, अब भला उसकी