मेरा आजीवन कारावास - Mera Aajivan Karavas

वापस भेजने से पहले ही जल्दी-जल्दी में दूसरे बंधु को नाप-तौलकर काम देने के समय मेरे विभाग के बंदियों को छोड़ा गया तो मैं भी उनमें घुस गया। तभी दूर से वापस लौटते समय मेरी और मेरे बंधु की आंखें चार हो गई। विलायत जाते समय उन्होंने मुझे देखा जहां मेरी काया अपने भाग्योदय की लौकिक आशाओं की राख से सनी हुई थी, तो पल भर के लिए उन्हें जैसे काठ मार गया। उनके मुख से बस एक ही उद्गार फूटा, जो उनके मूक दुःखों, वेदनाओं का निष्कर्ष था, ‘‘तात्या, तू यहां कैसे आया?’’


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वापस भेजने से पहले ही जल्दी-जल्दी में दूसरे बंधु को नाप-तौलकर काम देने के समय मेरे विभाग के बंदियों को छोड़ा गया तो मैं भी उनमें घुस गया। तभी दूर से वापस लौटते समय मेरी और मेरे बंधु की आंखें चार हो गई। विलायत जाते समय उन्होंने मुझे देखा जहां मेरी काया अपने भाग्योदय की लौकिक आशाओं की राख से सनी हुई थी, तो पल भर के लिए उन्हें जैसे काठ मार गया। उनके मुख से बस एक ही उद्गार फूटा, जो उनके मूक दुःखों, वेदनाओं का निष्कर्ष था, ‘‘तात्या, तू यहां कैसे आया?’’


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