अपनी लौकिक आशा-आकांक्षाओं के भाग्योदय के तहस-नहस होने की निराशा का कड़वा घूंट पीकर ऊपर बंधुओं को सांत्वना देना, अपने आपको धीरज बंधाकर दूसरे को भी देना था, तथापि विवेक की सहायता से कर्तव्य के हलाहल का वह घूंट भी मैंने पी लिया। मैंने उन्हें सूचित किया कि लौकिक तथा भाग्योदय की आशा-आकांक्षाओं की राख शरीर पर मलकर लड़ते रहना है।
यह अलौकिक भाग्य नहीं है क्या
तो फिर दुःख काहे का? मेरी योग्यता, कर्तृव्य सब मटियामेट होता, यदि
अपनी लौकिक आशा-आकांक्षाओं के भाग्योदय के तहस-नहस होने की निराशा का कड़वा घूंट पीकर ऊपर बंधुओं को सांत्वना देना, अपने आपको धीरज बंधाकर दूसरे को भी देना था, तथापि विवेक की सहायता से कर्तव्य के हलाहल का वह घूंट भी मैंने पी लिया। मैंने उन्हें सूचित किया कि लौकिक तथा भाग्योदय की आशा-आकांक्षाओं की राख शरीर पर मलकर लड़ते रहना है।
यह अलौकिक भाग्य नहीं है क्या
तो फिर दुःख काहे का? मेरी योग्यता, कर्तृव्य सब मटियामेट होता, यदि