परीक्षा के क्षण में घटिया सिद्व होता तो ‘सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति। गाण्डीवं Ûंसते हस्तात्वक्चैव परिदह्मते।’ किंतु ऐसी अवस्था तब होती यदि मैं कर्तव्य-विमुख होता या किसी का विश्वासघात किया होता। परंतु ऐसा भी न होते हुए यथा प्राप्त संकटों से सामना करने और स्वार्थ को जड़ से उखाड़ लोगों को कर्तव्य क्षेत्र में संकट भोगने के लिए तैयार होने में ही आपका, हमारा और इन सभी का सच्चा कर्तव्य और योग्यता प्रकट हो रही है। यशापयश संयोग की बात है। आजन्म युद्व लड़ते,
परीक्षा के क्षण में घटिया सिद्व होता तो ‘सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति। गाण्डीवं Ûंसते हस्तात्वक्चैव परिदह्मते।’ किंतु ऐसी अवस्था तब होती यदि मैं कर्तव्य-विमुख होता या किसी का विश्वासघात किया होता। परंतु ऐसा भी न होते हुए यथा प्राप्त संकटों से सामना करने और स्वार्थ को जड़ से उखाड़ लोगों को कर्तव्य क्षेत्र में संकट भोगने के लिए तैयार होने में ही आपका, हमारा और इन सभी का सच्चा कर्तव्य और योग्यता प्रकट हो रही है। यशापयश संयोग की बात है। आजन्म युद्व लड़ते,