उसकी सफलता देखने तथा भोगने के लिए शेष बचूं’ इस तरह दुष्ट एवं जनहित विघातक कापुरूष कामना मन में रखते हुए, वह फौजी तब अवश्य अन्य लोगों के साथा युद्व का सामना करता अचलए अडिग बनकर जूझता ही रहा न? इस प्रश्न पर उसका वास्तविक कर्तव्य निर्भर रहता है। मेरे विचार से इस कसौटी पर हम सभी सफल रहे हैं। और इसीलिए हम लौकिक एवं भाग्योदय के सुवर्ण-वलय में जितने कृतार्थ नहीं बनते उतने उस भाग्योदय की अलौकिक राख शरीर पर मलकर आज इस तरह अवश
उसकी सफलता देखने तथा भोगने के लिए शेष बचूं’ इस तरह दुष्ट एवं जनहित विघातक कापुरूष कामना मन में रखते हुए, वह फौजी तब अवश्य अन्य लोगों के साथा युद्व का सामना करता अचलए अडिग बनकर जूझता ही रहा न? इस प्रश्न पर उसका वास्तविक कर्तव्य निर्भर रहता है। मेरे विचार से इस कसौटी पर हम सभी सफल रहे हैं। और इसीलिए हम लौकिक एवं भाग्योदय के सुवर्ण-वलय में जितने कृतार्थ नहीं बनते उतने उस भाग्योदय की अलौकिक राख शरीर पर मलकर आज इस तरह अवश