मेरा आजीवन कारावास - Mera Aajivan Karavas



और कार्यो के विषय में

ं ं ंउस दिन जब हाईकोर्ट में मेरा दंड घोषित हो रहा था, इस संबंध में मैंने दंड के जबड़े में दरदराकर पीसे जाते समय अपने ह्नदय का विश्वास तथा भाव मुखरित करनेवाला ‘सारथि जिसका अभिमानी। कुष्णजी और राम सेनानी। ऐसी कोटी-कोटी तव सेना। वह ना रूके वह हमारे बिना।’¹ ं ं ं ंआशय से भरा पत्र मैंने गुप्त रूप से बंधु को भेजा था। उस पत्र ने बंधु को तो सांत्वना दी ही, परंतु उसे लिखते लिखते मेरे विवके का डगमगाना


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और कार्यो के विषय में

ं ं ंउस दिन जब हाईकोर्ट में मेरा दंड घोषित हो रहा था, इस संबंध में मैंने दंड के जबड़े में दरदराकर पीसे जाते समय अपने ह्नदय का विश्वास तथा भाव मुखरित करनेवाला ‘सारथि जिसका अभिमानी। कुष्णजी और राम सेनानी। ऐसी कोटी-कोटी तव सेना। वह ना रूके वह हमारे बिना।’¹ ं ं ं ंआशय से भरा पत्र मैंने गुप्त रूप से बंधु को भेजा था। उस पत्र ने बंधु को तो सांत्वना दी ही, परंतु उसे लिखते लिखते मेरे विवके का डगमगाना


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