मेरा आजीवन कारावास - Mera Aajivan Karavas

बार तो वह प्रसंग पुनः आनेवाला था। उस रात कोठरी की जिन सलाखों से लटककर प्रायः बंदी स्वयं फांसी लगा लेते थे, उस खिड़की की ओर लुभावनी दृष्टि से मैंने चार-पांच बार तो देखा ही होगा। बुद्वि और मन का संवाद मैं तटस्थतापूर्वक सुन रहा था, जिसे आगे चलकर मैंने एक कविता में गं्रथित किया है।¹ बार-बार मन के इस तर्क को विवेक उत्तर देत, ‘बावले, यह तुम्हारा अंहकार है। मान लो, तुम्हारा कर्तृव्य, कर्तव्य पराक्रम एक यंत्र है, जो ऐसी प्रचंड गति प्रदान करने की क्षमता रखता है,


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बार तो वह प्रसंग पुनः आनेवाला था। उस रात कोठरी की जिन सलाखों से लटककर प्रायः बंदी स्वयं फांसी लगा लेते थे, उस खिड़की की ओर लुभावनी दृष्टि से मैंने चार-पांच बार तो देखा ही होगा। बुद्वि और मन का संवाद मैं तटस्थतापूर्वक सुन रहा था, जिसे आगे चलकर मैंने एक कविता में गं्रथित किया है।¹ बार-बार मन के इस तर्क को विवेक उत्तर देत, ‘बावले, यह तुम्हारा अंहकार है। मान लो, तुम्हारा कर्तृव्य, कर्तव्य पराक्रम एक यंत्र है, जो ऐसी प्रचंड गति प्रदान करने की क्षमता रखता है,


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