पाषाण सदृश कठोर पुस्तकों को पठनीय समझता था? राम-राम! वह स्वयं कुछ कम पढ़ा-लिखा नहीं था। हाई स्कूल की पूरी पांच कक्षा तक पढे़ थे महाशय। इतने प्रकांड पंडित को इसका परीक्षकत्व सौंपा गया था कि कारागृह में कौन सी पुस्तक आनी चाहिए। वह पुस्तक सरल अंगे्रजी भाषा की तथा सरल विषय की हो, जिसको खोलते ही बारी साहब को पूरा बोध हो। अन्यथा यदि वह कोई दर्शन अथवा समाजशास्त्र की गूढ़ पुस्तक हो तो दो-चार पन्ने पलटते ही ‘नाॅनसेंस ट्रश’ कहकर
पाषाण सदृश कठोर पुस्तकों को पठनीय समझता था? राम-राम! वह स्वयं कुछ कम पढ़ा-लिखा नहीं था। हाई स्कूल की पूरी पांच कक्षा तक पढे़ थे महाशय। इतने प्रकांड पंडित को इसका परीक्षकत्व सौंपा गया था कि कारागृह में कौन सी पुस्तक आनी चाहिए। वह पुस्तक सरल अंगे्रजी भाषा की तथा सरल विषय की हो, जिसको खोलते ही बारी साहब को पूरा बोध हो। अन्यथा यदि वह कोई दर्शन अथवा समाजशास्त्र की गूढ़ पुस्तक हो तो दो-चार पन्ने पलटते ही ‘नाॅनसेंस ट्रश’ कहकर