मेरा आजीवन कारावास - Mera Aajivan Karavas

पर किसी बंदी को स्लेट का टुकड़ा हाथ में लेते, पुस्तक पढ़ते ओर इतना ही नहीं, उसे अपने पास रखे भी देखते तो उनके तलवों में आग लग जाती। ‘किताब मंगता है, साला! ये जगह स्कूल नहीं है। अपने बाप के घर क्यों नहीं पढ़ा? भेज दो साले को कोल्हू में। कम-से-कम साले की किताब तो जब्त कर लो।’

बारी साहब कई बार अपनी राय प्रकट करते कि विशेष रूप में राजबंदियों को पुस्तकें पढ़ने के लिए देने से उनकी पुस्तकीय भावना एवं ‘नाटकीय’ वर्णन पढ़कर उनकी बुद्वि,


587 of 2228

पर किसी बंदी को स्लेट का टुकड़ा हाथ में लेते, पुस्तक पढ़ते ओर इतना ही नहीं, उसे अपने पास रखे भी देखते तो उनके तलवों में आग लग जाती। ‘किताब मंगता है, साला! ये जगह स्कूल नहीं है। अपने बाप के घर क्यों नहीं पढ़ा? भेज दो साले को कोल्हू में। कम-से-कम साले की किताब तो जब्त कर लो।’

बारी साहब कई बार अपनी राय प्रकट करते कि विशेष रूप में राजबंदियों को पुस्तकें पढ़ने के लिए देने से उनकी पुस्तकीय भावना एवं ‘नाटकीय’ वर्णन पढ़कर उनकी बुद्वि,


587 of 2228