जो कारावास की यातनाओं से ‘ठिकाने’ पर आई थी, पुनः पूर्व संस्कारयुक्त पठन से भड़की हुई आग में जलने लगती है, एतदर्थ यदि उन्हें मनुष्य बनाना हो, सुधारना हो तो इस तरह की पुस्तकें नहीं देनी चाहिए। यदि कोई राजबंदी पढ़ने की ओर ध्यान न देते हुए स्थिति के अधोगामी आकर्षण से कुटिल बना दिखता, तो बारी साहब को लगता कि वह सुधर रहा है। उसे वह कड़े पहरे अथवा क्रूर दृष्टिक्षेप में नहीं रखता। इन विचारोंवाले उस बंदीपाल के ये विचार उसके तत्कालीन
जो कारावास की यातनाओं से ‘ठिकाने’ पर आई थी, पुनः पूर्व संस्कारयुक्त पठन से भड़की हुई आग में जलने लगती है, एतदर्थ यदि उन्हें मनुष्य बनाना हो, सुधारना हो तो इस तरह की पुस्तकें नहीं देनी चाहिए। यदि कोई राजबंदी पढ़ने की ओर ध्यान न देते हुए स्थिति के अधोगामी आकर्षण से कुटिल बना दिखता, तो बारी साहब को लगता कि वह सुधर रहा है। उसे वह कड़े पहरे अथवा क्रूर दृष्टिक्षेप में नहीं रखता। इन विचारोंवाले उस बंदीपाल के ये विचार उसके तत्कालीन