अपने आपको कदाचित् पापी समझने के स्थान पर राजबंदी समझने लगते हैं।’
पुस्तकों का परिणाम
एक प्रकार से उस परिणाम तक अंदमानीय अधिकारियों का अभिप्राय सत्य था कि वनवास में धर्मादिक पांडवों के मन को जब-जब आत्मनिंदा, आत्मलज्जा तथा हताशभाव संत्रस्त करता, तब-तब यह कहते हुए कि ‘अरे युधिष्ठिर! न्लराज पर भी।
इसी तरह का संकट आया था और प्रभु रामचंद पर भी’ उनके भग्न उत्साह को पुनः चेतना प्रदान करने के लिए ऋषियों के आख्यानों का यही
अपने आपको कदाचित् पापी समझने के स्थान पर राजबंदी समझने लगते हैं।’
पुस्तकों का परिणाम
एक प्रकार से उस परिणाम तक अंदमानीय अधिकारियों का अभिप्राय सत्य था कि वनवास में धर्मादिक पांडवों के मन को जब-जब आत्मनिंदा, आत्मलज्जा तथा हताशभाव संत्रस्त करता, तब-तब यह कहते हुए कि ‘अरे युधिष्ठिर! न्लराज पर भी।
इसी तरह का संकट आया था और प्रभु रामचंद पर भी’ उनके भग्न उत्साह को पुनः चेतना प्रदान करने के लिए ऋषियों के आख्यानों का यही