मेरा आजीवन कारावास - Mera Aajivan Karavas

विशेषतः रविवार सुबह नौ बजे तक हमें वनज करने अथवा घास काटने के लिए अपनी कोठरियांे से बाहर रखा जाता, तब जो पांच-दस राजबंदी मेरे कक्ष में होते, उनके साथ मैं एक तरह बैठ जाता। हर एक को एक विषय दिया जाता। वह उस पर बोलता। उसके पश्चात् उस विषय पर चर्चा होती। अंत में यथासंभव एक राष्ट्रगीत गाया जाता। वह गोष्ठी प्रायः भागते घोड़े पर ही होती, न कि सिंहासन अथवा योगासन पर। क्योंकि इसका कोई नियम नहीं था कि कब


पहरेदार गिरता-पड़ता, हांफता हुआ आता और कहता,


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विशेषतः रविवार सुबह नौ बजे तक हमें वनज करने अथवा घास काटने के लिए अपनी कोठरियांे से बाहर रखा जाता, तब जो पांच-दस राजबंदी मेरे कक्ष में होते, उनके साथ मैं एक तरह बैठ जाता। हर एक को एक विषय दिया जाता। वह उस पर बोलता। उसके पश्चात् उस विषय पर चर्चा होती। अंत में यथासंभव एक राष्ट्रगीत गाया जाता। वह गोष्ठी प्रायः भागते घोड़े पर ही होती, न कि सिंहासन अथवा योगासन पर। क्योंकि इसका कोई नियम नहीं था कि कब


पहरेदार गिरता-पड़ता, हांफता हुआ आता और कहता,


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