विषयक शंकाएं तथा आपेक्ष लिखे थे अर्थात् खोदे हुए थे। परंतु पेंसिल मिलना असंभव होने के कारण अपनी पुस्तक पर भी पढ़ते-पढ़ते जो शंकाएं उभरती, उन्हें और उत्तरों को कांटों से खोदना भी स्पष्ट है कि कारागृहीय दंड देने योग्य (ब्वहदपेंइसम ब्तपउम) ही था। भौंड़ा न सही पर निश्चित और शिष्ट कोटिक्रम में बोलना हो तो बारी यह कहते, ‘ऐ, यह जेल है, स्कूल नहीं। पढ़ने का इतना शौक है तो बाप के घर क्यों नही सीखा, इधर आया ही क्यांे? लड़ा ेमत, पढ़ा ेमत, काम करो, बस काम! और हम कुछ नहीं जानता।’
विषयक शंकाएं तथा आपेक्ष लिखे थे अर्थात् खोदे हुए थे। परंतु पेंसिल मिलना असंभव होने के कारण अपनी पुस्तक पर भी पढ़ते-पढ़ते जो शंकाएं उभरती, उन्हें और उत्तरों को कांटों से खोदना भी स्पष्ट है कि कारागृहीय दंड देने योग्य (ब्वहदपेंइसम ब्तपउम) ही था। भौंड़ा न सही पर निश्चित और शिष्ट कोटिक्रम में बोलना हो तो बारी यह कहते, ‘ऐ, यह जेल है, स्कूल नहीं। पढ़ने का इतना शौक है तो बाप के घर क्यों नही सीखा, इधर आया ही क्यांे? लड़ा ेमत, पढ़ा ेमत, काम करो, बस काम! और हम कुछ नहीं जानता।’