केवल पढ़कर क्या करोगे
इस बाह्म प्रतिबंध के अतिरिक्त राजबंदियों के ज्ञानवर्धन में एक बाधा और थी, उनमें से कुछ लोगों की अपनी ही उदासीनता। राजबंदियों में से प्रायः सभी लोग राज्य क्रांतिकारी थे। अतः ज्ञान की अपेक्षा कर्म की ओर उनका रूझान होना स्वाभाविक था। उनका सहज अभिप्राय होता कि पढ़-लिखकर क्या करना है, कर्म करना चाहिए, त्याग करना होगा। उन्हें इस तरह समझाना पड़ता-आप में से जो प्रायः पांच-सात वर्षों के दंड के लिए ही आए हैं,
केवल पढ़कर क्या करोगे
इस बाह्म प्रतिबंध के अतिरिक्त राजबंदियों के ज्ञानवर्धन में एक बाधा और थी, उनमें से कुछ लोगों की अपनी ही उदासीनता। राजबंदियों में से प्रायः सभी लोग राज्य क्रांतिकारी थे। अतः ज्ञान की अपेक्षा कर्म की ओर उनका रूझान होना स्वाभाविक था। उनका सहज अभिप्राय होता कि पढ़-लिखकर क्या करना है, कर्म करना चाहिए, त्याग करना होगा। उन्हें इस तरह समझाना पड़ता-आप में से जो प्रायः पांच-सात वर्षों के दंड के लिए ही आए हैं,