वे भगवान की दया से जब कुक्त होंगे तब उन्हें कार्यक्षेत्र में यथायोग्य कार्य करने हैं। उस समय पुस्तकें मत पढ़ना। परंतु इधर जब तक पढ़ने से अधिक उपयोगी प्रत्यक्ष कार्य करना असंभव है तब तक तो आपके ध्येय की दृष्टि से अधिक उपयोगी प्रत्यक्ष कार्य करना असंभव है तब तक तो आपके ध्येय की दृष्टि से यह समय ज्ञानार्जन में व्यतीत करना अत्यंत आवश्यक है। संपादित करना (प्राप्त करना) जितना कठिन है उतना ही उसे संभालना भी कठिन होता है और उसमें पारंगत न होने पर तो और भी कठिन राजनीतिक,
वे भगवान की दया से जब कुक्त होंगे तब उन्हें कार्यक्षेत्र में यथायोग्य कार्य करने हैं। उस समय पुस्तकें मत पढ़ना। परंतु इधर जब तक पढ़ने से अधिक उपयोगी प्रत्यक्ष कार्य करना असंभव है तब तक तो आपके ध्येय की दृष्टि से अधिक उपयोगी प्रत्यक्ष कार्य करना असंभव है तब तक तो आपके ध्येय की दृष्टि से यह समय ज्ञानार्जन में व्यतीत करना अत्यंत आवश्यक है। संपादित करना (प्राप्त करना) जितना कठिन है उतना ही उसे संभालना भी कठिन होता है और उसमें पारंगत न होने पर तो और भी कठिन राजनीतिक,