बंदियों की एक-न-एक टोली अंदमान में आती थी और आने के बाद कक्षमय (सेल्युलर) कारागार में बंद की जाती थी। पहले सप्ताह में उनका महत्तव इतना बढ़ता कि जमादार आदि सभी को उनकी चिरौरियां करनी पड़ती, क्यांेकि उनमें पने गांव का या अपनी भाषा का भी कोई बंदी आया हो तो उससे अपने आप्तजनों का कुछ-न-कुछ तो समाचार निकाला जा सकता था। परिचित अथवा व्यक्ति के दर्शन मात्र से जो एक आत्मीयता भरी प्रीति मन में उत्पन्न होती है, उसकी अनुभूति दूर देश
बंदियों की एक-न-एक टोली अंदमान में आती थी और आने के बाद कक्षमय (सेल्युलर) कारागार में बंद की जाती थी। पहले सप्ताह में उनका महत्तव इतना बढ़ता कि जमादार आदि सभी को उनकी चिरौरियां करनी पड़ती, क्यांेकि उनमें पने गांव का या अपनी भाषा का भी कोई बंदी आया हो तो उससे अपने आप्तजनों का कुछ-न-कुछ तो समाचार निकाला जा सकता था। परिचित अथवा व्यक्ति के दर्शन मात्र से जो एक आत्मीयता भरी प्रीति मन में उत्पन्न होती है, उसकी अनुभूति दूर देश