मेरा आजीवन कारावास - Mera Aajivan Karavas

ससुराल में गई कन्या को तब होती होगी ज बवह अपने मायके के गांव के आदमी को देखती है या वह बंदी यह अनुभव करता होगा जो स्वदेश से निष्कासित होकर द्वीपांतर दर-दर भटककर अथवा अटककर दिन व्यतीत करता हो। उस चालान से आए उस स्वभाषी, पूर्व परिचित को-हमारा मुलुकी, हमारे देश का-यह उपाधि प्राप्त होती। अंदमान में यह उपाधि मन को अन्य सभी उपाधियों से अधिक मधुर, लुभावनी प्रतीत होती थी। इस मुलुकीपन की व्याख्या भी आवश्यकतावश बहुत की विस्तृत


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ससुराल में गई कन्या को तब होती होगी ज बवह अपने मायके के गांव के आदमी को देखती है या वह बंदी यह अनुभव करता होगा जो स्वदेश से निष्कासित होकर द्वीपांतर दर-दर भटककर अथवा अटककर दिन व्यतीत करता हो। उस चालान से आए उस स्वभाषी, पूर्व परिचित को-हमारा मुलुकी, हमारे देश का-यह उपाधि प्राप्त होती। अंदमान में यह उपाधि मन को अन्य सभी उपाधियों से अधिक मधुर, लुभावनी प्रतीत होती थी। इस मुलुकीपन की व्याख्या भी आवश्यकतावश बहुत की विस्तृत


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