हो गई थी। अपने गांव का वह अपना-उस गंवारू भावना की जगह अपने प्रदेश का और विशेषकर अपनी भाषा बोलनेवाला वह स्वदेशीय, अपने मुलुक का यह सहज ही माना जाने लगा। किसी अनपढ़ अछूत को भी मराठी या बंगला भाषा बोलते हुए देखकर वहां का ब्राह्मण भी उसे अपना स्वदेशीय, अपना मुलुकी समझकर उससे प्रेमपूर्वक बातचीत करता, उसकी सहायता करता। तब
कोई भी यह बात सहज समझ लेता कि हिंदुस्थान में भौगोलिक विभागों से अधिक वर्तमान स्थिति में भाषा-विभाग किस
हो गई थी। अपने गांव का वह अपना-उस गंवारू भावना की जगह अपने प्रदेश का और विशेषकर अपनी भाषा बोलनेवाला वह स्वदेशीय, अपने मुलुक का यह सहज ही माना जाने लगा। किसी अनपढ़ अछूत को भी मराठी या बंगला भाषा बोलते हुए देखकर वहां का ब्राह्मण भी उसे अपना स्वदेशीय, अपना मुलुकी समझकर उससे प्रेमपूर्वक बातचीत करता, उसकी सहायता करता। तब
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