करते हुए ‘समाचार! स्माचार!’ पूछते-पूछते उसके कान खाते रहते। उसकी अनुनय-विनय करते। राजबंदी उसका काम भी अपने हाथों में मुंगरी लेकर छिलका कूटकर गुपचुप कर देते, ताकि वह प्रसन्न होकर मनःपूर्वक समाचार बता दें। परंतु भले ही शिक्षित हो, तथापि इस तरह के साधारण बंदी को भला राजनीति की कितनी जानकारी हो सकती है? ‘क्यों जी, स्वदेश का अमुक आंदोलन कैसा रंग ला रहा है?’ राजबंदियों के इस उत्सुक प्रश्न को प्रायः ‘कुछ नहीं, इधर-उधर हर जगह शांति-ही-शांति है। ‘यही घिसा-पिटा उत्तर मिलता,
करते हुए ‘समाचार! स्माचार!’ पूछते-पूछते उसके कान खाते रहते। उसकी अनुनय-विनय करते। राजबंदी उसका काम भी अपने हाथों में मुंगरी लेकर छिलका कूटकर गुपचुप कर देते, ताकि वह प्रसन्न होकर मनःपूर्वक समाचार बता दें। परंतु भले ही शिक्षित हो, तथापि इस तरह के साधारण बंदी को भला राजनीति की कितनी जानकारी हो सकती है? ‘क्यों जी, स्वदेश का अमुक आंदोलन कैसा रंग ला रहा है?’ राजबंदियों के इस उत्सुक प्रश्न को प्रायः ‘कुछ नहीं, इधर-उधर हर जगह शांति-ही-शांति है। ‘यही घिसा-पिटा उत्तर मिलता,