वत्तपत्रों के टुकड़े कूड़े के साथ बाहर फंेके जाते। उनमें से जल्दी-जल्दी दो-चार चुनकर गाड़ी के तख्तों मंे अथवा सामान में ठूंस लेना होता था। आते-जाते फिर उन टुकड़ों को पढ़ना। इनसे ही बड़ा मजा आता। एकाध टुकड़ा
किसी एडिनबरोशायर के किसी ग्रामीण पत्र का, कोई टुकड़ा क्रिकेट के लिए समर्पित पत्र का, कोई किसी बीभत्स उपन्यास का तो कोई सन् अठारह सौ सत्तर साल के पत्र का। किसी में जूते लपेटे, तो किसी में अंडे बांधे हुए, किसी में धोबी के
वत्तपत्रों के टुकड़े कूड़े के साथ बाहर फंेके जाते। उनमें से जल्दी-जल्दी दो-चार चुनकर गाड़ी के तख्तों मंे अथवा सामान में ठूंस लेना होता था। आते-जाते फिर उन टुकड़ों को पढ़ना। इनसे ही बड़ा मजा आता। एकाध टुकड़ा
किसी एडिनबरोशायर के किसी ग्रामीण पत्र का, कोई टुकड़ा क्रिकेट के लिए समर्पित पत्र का, कोई किसी बीभत्स उपन्यास का तो कोई सन् अठारह सौ सत्तर साल के पत्र का। किसी में जूते लपेटे, तो किसी में अंडे बांधे हुए, किसी में धोबी के