संस्था थी गोरों का शौचगृह। उधर उनके रोज के ‘टाइम्स’ आदि पत्र पढ़कर फंेके हुए अथवा टुकड़े किए हुए रखे जाते। कोई भंडारी, जो इस अखंड भंडार की देखभाल करता, इन पत्रों को कूड़े में फंेकवा देता और हम उन्हें पढ़ लेते।
कभी-कभी ‘परदेसी डाक’ के साथ स्वदेशी डाक की भी सहायता मिलती। कारागार के कारखाने में छोटी-बड़ी कीलें, बिरंजी आदि सामान किसी पुराने समाचार-पत्र में लपेटकर रखा जाता था। उन टुकड़ो अवश्य उठाता। वह कभी-कभी तो इतना गंदा, मैला-कुचला
संस्था थी गोरों का शौचगृह। उधर उनके रोज के ‘टाइम्स’ आदि पत्र पढ़कर फंेके हुए अथवा टुकड़े किए हुए रखे जाते। कोई भंडारी, जो इस अखंड भंडार की देखभाल करता, इन पत्रों को कूड़े में फंेकवा देता और हम उन्हें पढ़ लेते।
कभी-कभी ‘परदेसी डाक’ के साथ स्वदेशी डाक की भी सहायता मिलती। कारागार के कारखाने में छोटी-बड़ी कीलें, बिरंजी आदि सामान किसी पुराने समाचार-पत्र में लपेटकर रखा जाता था। उन टुकड़ो अवश्य उठाता। वह कभी-कभी तो इतना गंदा, मैला-कुचला