होता कि उसे कूड़े के ढेर में से अथवा नाली में से दो पतली लकड़ियों की सहायता से निकालना पड़ता। लकड़ियांे से ही उसे फैलाना पड़ता और पढ़ना पड़ता। परंतु उस दशा में भी उसे पढे़ बिना रहा नहीं जाता था। एक बार गोखले के शिक्षा प्रस्ताव से उपजी निराशा पर लिखा एक सुंदर अंश ऐसे ही मैले-कुचले कागज की परची पर पढ़ने का स्मरण मुझे है और यह भी स्मरण है कि गोखले वह शिक्षा प्रस्ताव लाए हैं, इसका देश में ज्ञानामृत के मुक्त प्याऊ खुले होंगे। कोई मिल खुल गई,
होता कि उसे कूड़े के ढेर में से अथवा नाली में से दो पतली लकड़ियों की सहायता से निकालना पड़ता। लकड़ियांे से ही उसे फैलाना पड़ता और पढ़ना पड़ता। परंतु उस दशा में भी उसे पढे़ बिना रहा नहीं जाता था। एक बार गोखले के शिक्षा प्रस्ताव से उपजी निराशा पर लिखा एक सुंदर अंश ऐसे ही मैले-कुचले कागज की परची पर पढ़ने का स्मरण मुझे है और यह भी स्मरण है कि गोखले वह शिक्षा प्रस्ताव लाए हैं, इसका देश में ज्ञानामृत के मुक्त प्याऊ खुले होंगे। कोई मिल खुल गई,