देशभक्ति के बीज साधारण जनता तथा बंदी जगत् के मन में जड़ पकड़ते गए वैसे-वैसे ही यह साहस सेवा और कर्तव्य से प्रेरित होने लगा। परंतु प्रथम दो-तीन वर्षों में वृत्तपत्र का इतना सा टुकड़ा लाने के लिए बंदियों के सामने बहुत नाक रगड़नी पड़ती, कई बार उन्हें प्रलोभन दिखाने की कोई अन्य शक्ति न होने से राजबंदी अपनी रोटी उसे देकर स्वयं भूखे रहते, जिससे संध्या तक स्वदेश का कम-से-कम एकाध संदेश तो सुन सकें।
कभी कारागार की दीवारों पर से फेंकी
देशभक्ति के बीज साधारण जनता तथा बंदी जगत् के मन में जड़ पकड़ते गए वैसे-वैसे ही यह साहस सेवा और कर्तव्य से प्रेरित होने लगा। परंतु प्रथम दो-तीन वर्षों में वृत्तपत्र का इतना सा टुकड़ा लाने के लिए बंदियों के सामने बहुत नाक रगड़नी पड़ती, कई बार उन्हें प्रलोभन दिखाने की कोई अन्य शक्ति न होने से राजबंदी अपनी रोटी उसे देकर स्वयं भूखे रहते, जिससे संध्या तक स्वदेश का कम-से-कम एकाध संदेश तो सुन सकें।
कभी कारागार की दीवारों पर से फेंकी